Wednesday, March 27, 2024

मकान

जो लोग पूरा जीवन मकान बनवाने में निकाल देते हैं उनके लिए जीवन का एक मात्र लक्ष्य उनका खुद का मकान देखना ही होता है ये स्टोरी जरूर पढे.

" जिसने ये बात कही है कि मूर्ख आदमी मकान बनवाता है, बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है, उसे ज़िंदगी का कितना गहरा तज़ुर्बा रहा होगा"

एक पुरानी सोसाइटी है....
पूरे सैक्टर में हर गली मे लोहे के गेट लगे हैं जिनपर गार्ड रहते हैं,कुछ गार्ड तो हमारे टाईम से अब तक हैं ।
सोसाइटी में पहुंच कर गार्ड से बात कर रहा था कि और क्या हाल है आप लोगों का, तभी मोटरसाइकिल पर एक आदमी आया और उसने झुक कर प्रणाम किया। 
मैंने पहचानने की कोशिश की। बहुत पहचाना-पहचाना लग रहा था,पर नाम याद नहीं आ रहा था। 
उसी ने कहा, पहचाने नहीं ? हम बाबू हैं,बाबू। 
उधर वाली आंटी के जी के घर काम करते थे।
मैंने पहचान लिया। अरे ये तो बाबू है। पिछली गली में 1287 नं० वाली आंटी जी का नौकर। 
एक ही बेटा था आंटी का,अंकल पहले ही गुजर चुके थे,बेटा स्नातक के बाद ही ऑस्ट्रेलिया चला गया था,वहीं पढ़ाई की,अब व्यवसाय,विवाह,घर सब ऑस्ट्रेलिया ही है ।
“अरे बाबू, तुम तो बहुत तंदुरुस्त हो गए हो। आंटी कैसी हैं?”
बाबू हंसा। “, “आंटी तो गईं।”
“गईं? कहां गईं? उनका बेटा विदेश में था, वहीं चली गईं क्या? ठीक ही किया उन्होंने। यहां अकेले रहने का क्या मतलब था?”
अब बाबू थोड़ा गंभीर हुआ। उसने हंसना रोक कर कहा, “भैया, आंटी जी भगवान जी के पास चली गईं।”
“भगवान जी के पास? ओह! कब?”
बाबू ने धीरे से कहा, “दो महीने हो गए।”
“क्या हुआ था आंटी को?”
“कुछ नहीं। बुढ़ापा ही बीमारी थी। उनका बेटा भी बहुत दिनों से नहीं आया था। उसे याद करती थीं। पर अपना घर छोड़ कर वहां नहीं गईं। कहती थीं कि यहां से चली जाऊंगी तो कोई मकान पर कब्जा कर लेगा। बहुत मेहनत से ये मकान बना है।”
“हां, वो तो पता ही है। तुमने खूब सेवा की। अब तो वो चली गईं। अब तुम क्या करोगे?”
अब बाबू फिर हंसा। मैं क्या करुंगा भैया? पहले अकेला था। अब बिहार से फैमिली को ले आया हूं। दोनों बच्चे और पत्नी अब यहीं रहते हैं।”
“यहीं मतलब उसी मकान में?”

“जी । आंटी के जाने के बाद उनका बेटा आया था। एक हफ्ता रुक कर चले गए। मुझसे कह गए हैं कि घर देखते रहना। चार बेडरूम का इतना बड़ा घर है। मैं अकेला कैसे देखता? भैया ने कहा कि तुम यहीं रह कर घर की देखभाल करते रहो। वो वहां से पैसे भी भेजने लगे हैं। और सबसे बड़ी बात ये है कि मेरे बच्चों को यहीं मोंटफोर्ड स्कूल में एडमिशन मिल गया है। अब आराम से हूं। कुछ-कुछ काम बाहर भी कर लेता हूं। भैया सारा सामान भी छोड़ गए हैं। कह रहे थे कि दूर देश ले जाने में कोई फायदा नहीं।”

मैं हैरान था। बाबू पहले साइकिल से चलता था। आंटी थीं तो उनकी देखभाल करता था। पर अब जब आंटी चली गईं तो वो चार बेडरूम के मकान में आराम से रह रहा है। 
आंटी अपने बेटे के पास नहीं गईं कि कहीं कोई मकान पर कब्जा न कर ले। 
बेटा मकान नौकर को दे गया है, ये सोच कर कि वो रहेगा तो मकान बचा रहेगा।

मुझे पता है, मकान बहुत मेहनत से बनते हैं। पर ऐसी मेहनत किस काम की, जिसके आप सिर्फ पहरेदार बन कर रह जाएं?
मकान के लिए आंटी बेटे के पास नहीं गईं। मकान के लिए बेटा मां को पास नहीं बुला पाया। 
सच कहें तो हम लोग मकान के पहरेदार ही हैं। 
जिसने मकान बनाया वो अब दुनिया में ही नहीं है। जो हैं, उसके बारे में तो बाबू भी जानता है कि वो अब यहां कभी नहीं आएंगे।

मैंने बाबू से पूछा कि तुमने भैया को बता दिया कि तुम्हारी फैमिली भी यहां आ गई है?
“इसमें बताने वाली क्या बात है ? वो अब कौन यहां आने वाले हैं? और मैं अकेला यहां क्या करता? 
जब आएंगे तो देखेंगे। पर जब मां थीं तो आए नहीं, उनके बाद क्या आना? मकान की चिंता है, तो वो मैं कहीं लेकर जा नहीं रहा। मैं तो देखभाल ही कर रहा हूं।” 
बाबू फिर हंसा। 
बाबू से मैंने हाथ मिलाया। मैं समझ रहा था कि बाबू अब नौकर नहीं रहा। वो मकान मालिक हो गया है। 
हंसते-हंसते मैंने बाबू से कहा, “भाई, जिसने ये बात कही है कि मूर्ख आदमी मकान बनवाता है, बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है, उसे ज़िंदगी का कितना गहरा तज़ुर्बा रहा होगा।”
“बाबू ने धीरे से कहा, “साहब, सब भाग्य की बात है।”
मैं वहां से चल पड़ा था ये सोचते हुए कि सचमुच सब भाग्य की ही बात है।
लौटते हुए मेरे कानों में बाबू की हंसी गूंज रही थी। 
“मैं मकान लेकर कहीं जाऊंगा थोड़े ही ? मैं तो देखभाल ही कर रहा हूं।”
मैं सोच रहा था, मकान लेकर कौन जाता है ? सब देखभाल ही तो करते हैं।

Wednesday, June 28, 2023

पहले पढ़ लेती...

रात के बारह बज रहे थे उसका फ़ोन आया "हेल्लो" किसी ने फुसफुसा-हट भरे लफ़्ज़ों में कहा।

 "हाँ, बोलो" उसने भी हौले से कहा। 
 
"सब तैयारी हो गई क्या, सुबह चार बजे की बस है।" 

"मैंने अपने कपड़ों का बैग तो पैक कर लिया है, पैसे और गहने लेने हैं।" 

"अपने सब डॉक्यूमेंट भी ले लेना, हो सकता है दोनों को नौकरी करनी पड़े, नया घर संसार जो बसाना है।" 

"ओके, मैं सब कुछ लेकर तुम्हें कॉल करती हूँ।"

उसने सबसे पहले माँ की अलमारी खोली, और उसमें से गहनों का डिब्बा निकाला, अपने लिए बनवाया गया मंगलसूत्र बैग में डाला, अंगूठी और झुमके पहन लिए, चूड़ियों का डिब्बा उठाकर बैग में डाल रही थी कि माँ की तस्वीर नीचे गिर पड़ी। 

उसे याद आया माँ की बरसों की इच्छा थी सोने का चूड़ा पहनने की। मगर जब पापा का एरियर मिला था तो जो चूड़ा बनवाया गया वो माँ ने ये कहकर उसके लिए सम्भाल कर रख दिया था कि जब सम्राट इंजीनियरिंग करके नौकरी लग जायेगा खूब सारे बनवा लूँगी। अभी तो तेरी शादी के लिए रख लेती हूँ, मेरी लाडो कितनी सुंदर लगेगी। उसने तस्वीर वापस अलमारी में रखी और चूड़ा बैग में रख लिया।

अब बारी थी नकदी की, घर में पिचहत्तर हज़ार पड़े थे पापा कल ही बैंक से एज्युकेशन लोन लेकर आये थे। सम्राट का आई आई टी का दूसरा साल चल रहा था। घर के रुपये पैसे का हिसाब और चाबी उसी के पास रहती थी। पापा हमेशा कहते हैं, जब ये पैदा हुई उससे पहले मैं स्टेशन पर कुली का काम करता था, जैसे ही ये पैदा हुई मेरी सरकारी नौकरी लग गई, यही मेरे भाग्य की देवी है, मेरी लाडो बेटी।" 

उसने अपने सभी डॉक्यूमेंट बैग में रख लिए, अब उसे चैक करना था की घर मे जाग तो नहीं है सब सो तो रहे हैं ना? सबसे पहले उसने सम्राट के कमरे के दरवाज़े से अंदर झाँका, सम्राट अभी तक पढ़ रहा था। उसकी खाने की थाली वैसे ही ढकी पड़ी थी जैसी वो रखकर आई थी।

 अगले कमरे में झाँका, माँ गहरी नींद सोई थी दवा लेकर । माँ हमेशा कहती है इस दवा में कोई गड़बड़ है जो नींद बहुत आती है । ये मुई शुगर भी बुरी बीमारी है लगकर खत्म ही नहीं होती।
 
 दरवाज़े की झिर्री में से पापा दिखाई दे रहे थे, वो अपनी वर्किंग टेबल पर बैठे व्यापारियों का बही खाता तैयार कर रहे थे। अभी कुछ दिन पहले ही उन्होंने ये नया काम ढूंढा था, पापा कहते है कॉमर्स पढ़ा हूँ बही खाते भूलने लगा था । चलो इससे भूलूंगा भी नही और एक्स्ट्रा इनकम भी हो जाएगी। 

सब अपने काम मे व्यस्त थे वो अपने कमरे में आई और उसे फ़ोन लगाया "सब रास्ते साफ़ हैं, सब अपने काम में लगे है मैं चुपचाप घर से बाहर निकालूँगी, उससे पहले फ़ोन करके बता दूँगी।" 

"अच्छा तुमने गहने और पैसे ले लिए न।" 

"हाँ, ले लिए तुम बारबार गहनों और पैसों का क्यूँ पूछ रहे हो, मैंने कहा न ले लिए।" 

"अरे बाबू वो इसलिये की नया घर संसार बसाना है, नई जगह जाते ही काम थोड़े मिल जाएगा। तो हमें घर के रूटीन कामों के लिए पैसा तो चाहिए ही मेरा मोबाइल भी बहुत पुराना है मुझे नया मोबाइल भी लेना है, और फिर मैं कोई न कोई नौकरी पकड़ लूँगा, जिससे हम आराम से जिंदगी गुजारेंगे।" 

"सुनो एक बात पूछुं ? क्या तुम में इतनी हिम्मत नहीं कि मुझे कमा कर अपने पैसे से रख सको,खाना खिला सको।"

 "ऐसी बात नहीं बाबू! तुम बिन रहा नहीं जाता, और हम जाते ही शादी कर लेंगे ओर काम मिलेगा तो आराम से जिएंगे न।"
 
 "सुनो तुम एक काम करो, अभी भागने का प्लान कैंसल करते हैं। पहले तुम काम करो और इतना पैसा कमा कर इकट्ठे कर लो कि दो महीने तक काम न भी मिले तो हमें भूखों मरने की नौबत न आये। जैसे ही तुम पैसा इकट्ठा कर लोगे हम भाग चलेंगे। तब तक इन्तज़ार करो, दो महीने तक न कर पाए तो मुझे भूल जाना।" 
 
"अरे बेबी, बात तो सुनो, मेरी बात….।" लड़की ने फ़ोन काट दिया वो अपने पिता के कमरे में झाँक आई। वो अभी भी बहीखाता कर रहे थे। 

उसने दरवाजा खटखटाया, "क्या बात है लाडो, सोई नहीं तुम।" 

"पापा एक बात कहनी है आप से सुनो ना। " 

"कहो लाडो।" 

"पापा जब तक सम्राट की पढ़ाई पूरी न हो मैं नौकरी करना चाहती हूँ, मेरी पढ़ाई पूरी हो चुकी है घर में बेकार बैठने से क्या फ़ायदा, घर में दो रुपये जुड़ेंगे ही।" उसकी बात सुनकर पापा ने लाडो के सर पर स्नेह से हाथ फिरा दिया पापा बेटी दोनों की आँखें नम थीं।


इन्टरनेट से सधन्यवाद...

Sunday, December 11, 2022

नाव का छेद

एक आदमी को एक नाव पेंट करने के लिए कहा गया। वह अपना पेंट और ब्रश लाया और नाव को चमकीले लाल रंग से रंगना शुरू किया, जैसा कि मालिक ने उससे कहा था।

पेंटिंग करते समय, उसने पतवार में एक छोटा सा छेद देखा और चुपचाप उसकी मरम्मत की।

जब उसने पेंटिंग पूरी की, तो उसने अपना पैसा लिया और चला गया।

अगले दिन, नाव का मालिक पेंटर के पास आया और उसे एक अच्छा चेक भेंट किया, जो पेंटिंग के भुगतान से कहीं अधिक था।

पेंटर को आश्चर्य हुआ और उसने कहा, "आपने मुझे नाव को पेंट करने के लिए पहले ही भुगतान कर दिया है सर!"

"लेकिन यह पेंट जॉब के लिए नहीं है। यह नाव में छेद की मरम्मत के लिए है।”

"आह! लेकिन यह इतनी छोटी सी सेवा थी... निश्चित रूप से यह मुझे इतनी छोटी सी चीज के लिए इतनी अधिक राशि देने के लायक नहीं है।"

“मेरे प्यारे दोस्त, तुम नहीं समझे। आपको बताते हैं क्या हुआ था:

“जब मैंने तुमसे नाव को पेंट करने के लिए कहा, तो मैं छेद का उल्लेख करना भूल गया।

“जब नाव सूख गई, तो मेरे बच्चे नाव ले गए और मछली पकड़ने की यात्रा पर निकल गए।

"वे नहीं जानते थे कि एक छेद था। मैं उस समय घर पर नहीं था।

"जब मैं वापस लौटा और देखा कि वे नाव ले गए हैं, तो मैं हताश हो गया क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में छेद था।

“मेरी राहत और खुशी की कल्पना कीजिए जब मैंने उन्हें मछली पकड़ने से लौटते देखा।

“फिर, मैंने नाव की जांच की और पाया कि आपने छेद की मरम्मत की थी!

"आप देखते हैं, अब, आपने क्या किया? आपने मेरे बच्चों की जान बचाई! मेरे पास आपके 'छोटे' अच्छे काम का भुगतान करने के लिए पर्याप्त धन नहीं है।

तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन, कब या कैसे, मदद करना जारी रखें, बनाए रखें, आँसू पोंछें, ध्यान से सुनें, और ध्यान से सभी 'लीक' की मरम्मत करें। आप कभी नहीं जानते कि कब किसी को हमारी आवश्यकता होती है, या कब परमेश्वर किसी के लिए सहायक और महत्वपूर्ण होने के लिए हमारे लिए एक सुखद आश्चर्य रखता है।

आपने कई लोगों के लिए कई 'नाव छेद' की मरम्मत की हो सकती है बिना यह जाने कि आपने कितने लोगों की जान बचाई है। ❤️

कुछ अलग करें... आप सबसे अच्छे बनें...

आपका दिन मंगलमय हो🌿

इन्टरनेट से सधन्यवाद..!

Monday, June 6, 2022

प्रभु कृपा

प्रभु कृपा दिखाई नही देती लेकिन होती जरूर है

एक औरत रोटी बनाते बनाते "ॐ नम: शिवाय " का जाप कर रही थी...
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अलग से पूजा का समय कहाँ निकाल पाती थी बेचारी, तो बस काम करते करते ही!!
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एकाएक धड़ाम से जोरों की आवाज हुई और साथ मे दर्दनाक चीख, कलेजा धक से रह गया...
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जब आंगन में दौड़ कर झांकी तो आठ साल का चुन्नू चित्त पड़ा था, खुन से लथपथ।
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मन हुआ दहाड़ मार कर रोये। परंतु घर मे उसके अलावा कोई था नही, रोकर भी किसे बुलाती, फिर चुन्नू को संभालना भी तो था।
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दौड़ कर नीचे गई तो देखा चुन्नू आधी बेहोशी में माँ माँ की रट लगाए हुए है।
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अंदर की ममता ने आंखों से निकल कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया।
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फिर 10 दिन पहले करवाये अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बावजूद ना जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गयी कि चुन्नू को गोद मे उठा कर पड़ोस के नर्सिंग होम की ओर दौड़ी।
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रास्ते भर भगवान् को जी भर कर कोसती रही, बड़बड़ाती रही, हे महादेव क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा, जो मेरे ही बच्चे को..!!
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खैर डॉक्टर साहब मिल गए और समय पर इलाज होने पर चुन्नू बिल्कुल ठीक हो गया।
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चोटें गहरी नही थी, ऊपरी थीं तो कोई खास परेशानी नही हुई...
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रात को घर पर जब सब टीवी देख रहे थे तब उस औरत का मन बेचैन था।
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भगवान् से विरक्ति होने लगी थी। एक मां की ममता प्रभुसत्ता को चुनौती दे रही थी।
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उसके दिमाग मे दिन की सारी घटना चलचित्र की तरह चलने लगी। कैसे चुन्नू आंगन में गिरा की एकाएक उसकी आत्मा सिहर उठी,
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कल ही तो पुराने चापाकल का पाइप का टुकड़ा आंगन से हटवाया है, ठीक उसी जगह था जहां चिंटू गिरा पड़ा था। अगर कल मिस्त्री न आया होता तो..?
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उसका हाथ अब अपने पेट की तरफ गया जहां टांके अभी हरे ही थे, ऑपरेशन के।
आश्चर्य हुआ कि उसने 20-22 किलो के चुन्नू को उठाया कैसे, कैसे वो आधा किलोमीटर तक दौड़ती चली गयी ?
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फूल सा हल्का लग रहा था चुन्नू। वैसे तो वो कपड़ों की बाल्टी तक छत पर नही ले जा पाती।
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फिर उसे ख्याल आया कि डॉक्टर साहब तो 2 बजे तक ही रहते हैं और जब वो पहुंची तो साढ़े 3 बज रहे थे,
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उसके जाते ही तुरंत इलाज हुआ, मानो किसी ने उन्हें रोक रखा था।
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उसका सर प्रभु चरणों मे श्रद्धा से झुक गया। अब वो सारा खेल समझ चुकी थी। मन ही मन प्रभु से अपने शब्दों के लिए क्षमा मांगी।
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तभी टीवी पर ध्यान गया तो प्रवचन आ रहा था..
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प्रभु कहते हैं, मैं तुम्हारे आने वाले संकट रोक नहीं सकता, लेकिन तुम्हे इतनी शक्ति दे सकता हूँ कि तुम आसानी से उन्हें पार कर सको, तुम्हारी राह आसान कर सकता हूँ। बस धर्म के मार्ग पर चलते रहो।

श्री राम चरित मानस में भी तुलसीदास जी ने लिखा है..

*तब तब प्रभु धरि बिबिध शरीरा।*
      *हरिहिं कृपानिधी सज्जन पीरा।।*

जब-जब भक्तो पर संकट आता है,,प्रभु विभिन्न रूपो में आकर अपने भक्तों का संकट हरते हैं..अक्सर लोग कहते भी है आज तो उन्होंने समय पे आकर जान बचा ली,,,कोन आया समय पर वही,,जब जब प्रभु धरि विविध शरीरा.. वो किसी भी रूप में आ सकता है..!!


🙏🙏🏽🙏🏾जय श्री राधे🙏🏼🙏🏿🙏🏻

इन्टरनेट से सधन्यवाद...

Thursday, June 2, 2022

व्यापार या दया

हमेशा की तरह दोपहर को सब्जीवाली दरवाजे पर आई और चिल्लाई, चाची, "आपको सब्जियां लेनी हैं?"

माँ हमेशा की तरह अंदर से चिल्लाई, "सब्जियों में क्या-क्या है?"

सब्जीवाली :- ग्वार, पालक, भिन्डी, आलू , टमाटर....

दरवाजे पर आकर माँ ने सब्जी के सिर पर भार देखा और पूछा, "पालक कैसे दिया?"

सब्जीवाली :- दस रुपए की एक गठी।

मां:- पच्चीस रुपए में चार दो।
सब्जीवाली:- चाची नहीं जमेगा।
मां : तो रहने दो।

सब्जीवाली आगे बढ़ गयी, पर वापस आ गई।
सब्जीवाली:- तीस रुपये में चार दूंगी।
मां:- नहीं, पच्चीस रुपए में चार लूंगी।
सब्जीवाली :- चाची बिलकुल नहीं जमेगा...

और वो फिर चली गयी.......

थोड़ा आगे जाकर वापस फिर लौट आई। दरवाजे पर माँ अब भी खड़ी थी, पता था सब्जीवाली फिर लौट कर आएगी। अब सब्जीवाली पच्चीस रुपये में चार देने को तैयार थी।

माँ ने सब्जी की टोकरी उतरने में मदद की, ध्यान से पलक कि चार गठीयाँ परख कर ली और पच्चीस रुपये का भुगतान किया। जैसे ही सब्जीवाली ने सब्जी का भार उठाना शुरू किया, उसे चक्कर आने लगा। माँ ने उत्सुकता से पूछा, "क्या तुमने खाना खा लिया?"

सब्जीवाली:- नई चाची, सब्जियां बिक जाएँ, तो किरना खरीदूंगी, फिर खाना बनाकर खाऊँगी।

माँ: एक मिनट रुको बस यहाँ। 

और फिर माँ ने उसे एक थाली में रोटी, सब्जी, चटनी, चावल और दाल परोस दिया, सब्जीवाली के खाने के बाद पानी दिया और एक केला भी थमाया।

सब्जीवाली धन्यवाद बोलकर चली गयी।

मुझसे नहीं रहा गया। मैंने अपनी माँ से पूछा, *"आपने इतनी बेरहमी से कीमत कम करवाई, लेकिन फिर जितना तुमने बचाया उससे ज्यादा का सब्जीवाली को खिलाया।"*

माँ हँसी और उन्होंने जो कहा वह मेरे दिमाग में आज तक अंकित है एक सीख कि तरह.....

*व्यापार करते समय दया मत करो, किन्तु दया करते समय व्यापर मत करो!*


इन्टरनेट से सधन्यवाद...

                      💞🙏💞