उनको ये शिकायत है कि मै बेवफ़ाई पे नहीं लिखता और मै सोचता हुं कि मै उनकी रुसवाई पे नहीं लिखता,
खुद अपने से ज्यादा बुरा जमाने मै कौन है?? मै इसीलिये औरों की बुराई पे नहीं लिखता,
कुछ तो आदत से मजबूर हुं और कुछ फ़ितरतों की पसन्द है, जख्म कितने भी गहरे हों मै उनकी दुहाई पे नहीं लिखता,
दुनिया का क्या है हर हाल मे इल्ज़ाम लगाती है, वरना क्या बात कि मैं कुछ अपनी सफ़ाई पे नहीं लिखता,
शान-ए-अमीरी पे करू कुछ अर्ज़ मगर एक रुकावट है, मेरे उसूल हैं मैं गुनाहों की कमाई पे नही लिखता,
उसकी ताक़त का नशा "मंत्र और कलमे" में बराबर है !! मेरे दोस्तों!! मैं मज़हब की, लड़ाई पे नही लिखता,
समंदर को परखने का मेरा, नज़रिया ही अलग है यारों!! मिज़ाज़ों पे लिखता हूँ मैं उसकी गहराई पे नही लिखता,
पराए दर्द को , मैं ग़ज़लों में महसूस करता हुं , ये सच है मैं शज़र से फल की, जुदाई पे नही लिखता,
"तजुर्बा तेरी मोहब्बत का" ना लिखने की वजह बस ये!! क़ि 'शायर' इश्क़ में ख़ुद अपनी, तबाही पे नही लिखता...
